Saturday, 8 December 2012

અભરખા ઉતારો.


આ તડકાને બીજે ગમે ત્યાં ઉતારો,
નહીં ’તો હરણને ન રણમાં ઉતારો.

હું મંદિરમાં આવ્યો અને દ્વાર બોલ્યું,
પગરખાં નહીં બસ અભરખા ઉતારો.

તમારી નજર મેં ઉતારી લીધી છે,
તમે મારા પરથી નજર ના ઉતારો.

આ પર્વતના માથે છે ઝરણાનાં બેડાં,
જરા સાચવી એને હેઠાં ઉતારો.

ફૂલો માંદગીનાં બિછાને પડ્યાં છે,
બગીચામાં થોડાક ભમરા ઉતારો.

ભીતરમાં જ જોવાની આદત પડી ગઈ,
હવે ભીંત પરથી અરીસા ઉતારો.

~ગૌરાંગ ઠાકર

आदमी


चांद पर जो चढ़ गया वह भी आदमी।
भूख से जो मर गया वह भी आदमी॥
    आदमी को नमन करे आदमी की भीड़,
    वह कैसा आदमी जो खोज रहा नीड़ ?
    गजरों के बीच में खड़ा है आदमी।
    फूलों को सींचते पड़ा है आदमी॥
आदमी ने दुनिया का ढंग बदल दिया,
वह भी कैसा आदमी जो रंग बदल दिया ?
भवन को बनाता है वह भी आदमी।
भवन को जलाता है वह भी आदमी॥
    आदमी पसीने से सागर भी दे गया,
    वह भी कैसा आदमी जो लहर में गया ?
    डूबा रंगरलियों में वह भी आदमी।
    मांग रहा गलियों में वह भी आदमी॥
आदमी बनो करो कुछ आदमी के काम,
लिख न पायेगा नहीं तो आदमी में नाम ?
बेटा भी भूल गया वह भी आदमी।
जग न जिसे भूलेगा वह भी आदमी॥

आचार्य सरोज द्विवेदी

मैंने देखा है



मैंने देखा है,
लोगों को प्यार करते
नादाने दिल को फुशलाकर
इश्क के इजहार करते
कभी हँसी को समेट मुट्ठी में
नादान कलियाँ खिल जाती
कहीं गम के अँधेरे साए में
डूबकर फुल झर जाते
दिल टूटना तो आम बात है
इंसान को मिट्टी बन देखा है
ढेर हो जाते
बेचकर अपना जमीर
अपना स्वाभिमान
जिस्म का सौदा करते लोग
मैंने देखा है, उन्हे भी प्यार करते
नादाने दिल को फुशलाकर
इश्क के इजहार करते
——-
घंटो घुम्म्कड़ी से घूमते प्रेमी
गहरे नींद में तकिये को चुमते प्रेमी
बनाकर ख्वाबों का पुलाव
छानकर रस की मलाई
अमृत का स्वाद चखते प्रेमी
देखा है, उन्हें भी
समय को नष्ट करते
बाप की कमाई और माँ की मज़बूरी
को धुंधलाकर ऐश करते
नादाने दिल को फुशलाकर
इश्क के इजहार करते
मैंने देखा है,
लोगों को प्यार करते
——-
सच -झूटलाकर मन बहलाकर
दिल की ही सुनते हैं ये
भरे महफ़िल में लाखों की भीड़ है
जनाब तन्हा से रहते हैं ये
कभी पन्नो पर चुभोकर कलम
एक ही दिशाओ में गोल-गोल
कभी रातों के गहरे अंधेर में
उल्लू की भातीं आँखे खोल
भगवान जाने क्या करते हैं ये
मैंने देखा हैं, इन्हें भी
नींद में…….!
प्यार का पाठ पढ़ते
भोग की रासलीला रचते
नादाने दिल को फुशलाकर
इश्क के इजहार करते
मैंने देखा है,
लोगों को प्यार करते
——-
सुरक्षात्मक प्रमेय अपनाकर
इश्क से तौबा करते लोग
खिंचकर रेखा सीमावाली
माप-तौल के चलते लोग
देखकर मुरब्बा हुस्न का
दिल ही दिल ये ललचाते है
चखने का तो दिल करता…पर!
बंधन से ये घबराते हैं
मैंने देखा हैं, इन्हें भी
खोकर गहरे खाई में
हाथों से बाण चलाते
केवल छन भर में उब जाते
नादाने दिल को फुशलाकर
इश्क के इजहार करते
मैंने देखा है,
लोगों को प्यार करते

Author Unknown

बेटियां


माँ -बाप का साथ हर पल निभाती है बेटियां,
माँ -बाप का साथ हर पल निभाती है बेटियां,
घर मै खुशाली हर पल लाती है बेटियां,
तमाम परेशानिया झेल कर खुश रहती है बेटियां,
घर मै उजाला न हो अगर न हो बेटियां,
रौनक घरो की हर पल बड़ती है बेटियां,
वो घर नहीं वीराना है,जिसमें न हो बेटियां,
नसीब भी बुलंद होते है उनके, होती है जिनकी बेटियां,
कह-कहों से हर पल गूंजता है आशियाना,
खामोशियों को दूर भगाती है बेटियां,
माँ-बाप की सारी खुशियाँ छीन जाती है ऐ “इन्सान ”
रुखसत जिस रोज़ घर से होती है बेटियां!!!

Monday, 3 December 2012

Gumrah (1963) - Chalo Ek Baar Phir Se

Gumrah (1963) - Chalo Ek Baar Phir Se


आज के दिन अनोखी हुई थी बात कोई,
मैं ने खुद को ही खुद से दी थी सौगात कोई,
जिस तरह कोई मुस्कुराये आईने में देख अक्स अपना .
मैं मुस्कुरायी अपनी गोदी में देख कर उसको ,
कहाँ गयी चुभन सुई की , ज़ख्म नश्तर का,
मैं गयी भूल भयानक वो दर्द का मंज़र,
नर्म ,नाज़ुक, गुनगुने होठों की वो पहली छुअन,
यकीन तब कहीं आया कि अब मैं एक माँ हूँ,
मेरी जुही की कली, वो मेरी मासूम परी,
उसी की शक्ल में लगता है, हाँ मैं जिंदा हूँ…

sinsera