Monday, 7 January 2013
Sunday, 23 December 2012
चीरहरण करती है दिल्ली
यमुना में गर चुल्लू भर पानी हो दिल्ली डूब मरो । स्याह ... चाँदनी चौक हो गया नादिरशाहो तनिक डरो । नहीं राजधानी के लायक चीरहरण करती है दिल्ली, भारत माँ की छवि दुनिया में शर्मसार करती है दिल्ली, संविधान की क़समें खाने वालो, कुछ तो अब सुधरो । तालिबान में, तुझमें क्या है फ़र्क सोचकर हमें बताओ, जो भी गुनहगार हैं उनको फाँसी के तख़्ते तक लाओ, दुनिया को क्या मुँह दिखलाओगे नामर्दो शर्म करो । क्राँति करो अब अत्याचारी महलों की दीवार ढहा दो, कठपुतली परधान देश का उसको मौला राह दिखा दो, भ्रष्टाचारी हाक़िम दिन भर गाल बजाते उन्हें धरो । गोरख पांडेय का अनुयायी चुप क्यों है मजनू का टीला, आसमान की झुकी निगाहें हुआ शर्म से चेहरा पीला, इस समाज का चेहरा बदलो नुक्कड़ नाटक बन्द करो । गद्दी का गुनाह है इतना उस पर बैठी बूढी अम्मा, दु:शासन हो गया प्रशासन पुलिस-तन्त्र हो गया निकम्मा , कुर्सी बची रहेगी केवल इटली का गुणगान करो ।
जयकृष्ण राय तुषार
Friday, 21 December 2012
मकसद-ए-हयात
भटकता रहा मैं इस हयात में
हर पल एक खुशी की तलाश में
साधक बना विकट कामना थी मेरी
कोई दुखी न रहे अपने हयात में
चुभा कांटा निकाला था बच्चे का एक दिन
बेशुमार खुशियां आयी थी अपने हयात में
रोते एक शख्स को हंसा दिया था एक दिन
जश्न मनाया इतनी खुशियां मिली हयात में
गम खत्म बेजारों का गर कर सकूं
जीने का मकसद मिल जाए इस हयात में
राजीव आनंद
प्रोफेसर कॉलोनी, न्यू बरगंड़ा
गिरिडीह, झारखंड़ 815301
आगे पढ़ें: रचनाकार: राजीव आनंद की कविताएँ http://www.rachanakar.org/2012/12/blog-post_8987.html#ixzz2FiBnZHAb
बचा पाया हूँ
थोड़ी मस्ती थोड़ा सा ईमान बचा पाया हूँ।
ये क्या कम है मैं अपनी पहचान बचा पाया हूँ।
मैंने सिर्फ़ उसूलों के बारे में सोचा भर था,
कितनी मुश्किल से मैं अपनी जान बचा पाया हूँ।
कुछ उम्मीदें, कुछ सपने, कुछ महकी-महकी यादें,
जीने का मैं इतना ही सामान बचा पाया हूँ।
मुझमें शायद थोड़ा-सा आकाश कहीं पर होगा,
मैं जो घर के खिड़की रोशनदान बचा पाया हूँ।
इसकी कीमत क्या समझेंगे ये सब दुनिया वाले,
अपने भीतर मैं जो इक इंसान बचा पाया हूँ
Subscribe to:
Posts (Atom)